व्यथा धरती मां की

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क्या क्या कष्ट हैं झेले मैंने , उफ तक ना कर पाई,
ऐ मानव तेरी जिद को अब तक मैं सहन करती आई।
घन धान्य से परिपूर्ण जीवन मैं सबको देती आई,
अपनी छाती पर हल के कठोर प्रहार को सहती आई।

अन्न,धन से परिपूर्ण कर जीवन खुशियां बरसाने आई,
सब उल्लसित रहे यह सोच कर पीड़ा सहती आई।
उदासी ना फैले जग में यही सोच कर विपदा हरने आई,
नदी, तालाब, समुद्र, हवा, पानी की सौगात संग ले लाई।

गगनचुम्बी अट्टालिकाओं का सुख वैभव देने आई,
अपनी मिट्टी से निर्मित मानव को सदा खुश करती आई।
पर नादान मानव जाति मेरे गुणों को समझ ना पाई,
मेरा अनुचित लाभ उठा मुझे आहत करती आई।

घमण्ड में चूर मानव में असीमित शक्ति है आज समाई,
स्वार्थपरता की भावना की तूने कैसी बंशी बजाई।
तिरस्कार मेरा कर तूने असीम खुशियां है पाईं,
मेरे कष्टों को अनदेखा करने की हिम्मत कहां से आई।

पेड़ – पौधों को नष्ट करने से आज भारी विपदा है आई,
पा इतना तिरस्कार रौद्र रूप मैं भी अपना ले आई।
कोरोना के रूप को ले मैं तुझे जगाने के लिए आई,
संभल जा ऐ मानव यह चेतावनी देने की मेरी बारी आई।

पेड़ – पौधों से सुसज्जित कर धरा को ले ले तू बधाई,
मैं हू तेरी धरती मां, बचा ले मुझे ये समझाने आई।
बच्चों पर प्यार बरसाने वाली मां की देख तू रुलाई,
गोदी में प्रलय खिलाने की ताकत याद मुझे है आई।

सोच ऐ मानव फिर तो तेरी भी फूट पड़ेगी रुलाई,
अपनी व्यथा सुनाने आज तेरी मां तेरे सामने आई।
जग की पीड़ा मत बड़ा ज्यादा बस यही है दुहाई,
अभी नहीं तो कभी नहीं ये बात समझ क्यूं नहीं आई ।

डॉ . रेखा मंडलोई ‘ गंगा ‘ इन्दौर

kavy ganga

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