‘पुस्तक समीक्षा’

काव्य गंगाकवयित्री डॉ. रेखा मंडलोई ‘गंगा

जीवन अनुभूतियों के साथ सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का उपक्रम:काव्य गंग

कविता की सर्जना के समय कवि के सामने यह संकट रहता है कि कम शब्दों में विराट अर्थ कैसे व्यंजित करे | क्योकि उसे शब्दों की मितव्ययता में ही भाषा व्याकरण और लोकजीवन के मर्म को साधते हुए काव्यशास्त्र के संस्कारों को भी सहेजना है |आज जबकि संवेदन तत्व,भाव तत्व, विचार तत्व लगभग विसर्जित ही हो रहे हैं हमारी सांस्कृतिक स्थिति के एक छोर पर करोड़ों आदमियों की निरक्षरता है दूसरे छोर पर हजारों बुद्धिजीवियों पर अमेरिकी संस्कृति का प्रभाव | क्या सिनेमा ,क्या संगीत,क्या अर्थशास्त्र क्या भाषा विज्ञान सब सूचनाओं की तरह प्रसारित साहित्य है | ऐसे सतही दौर में कवयित्री डॉ. रेखा मंडलोई का सद्यः प्रकाशित संग्रह काव्यशास्त्र की तमाम दुविधाओं से गुजरते हुए आकार लेता है ‘काव्य गंगा’ के रूप में | संवेदना के अखिल भारतीय आयाम को सृजन के स्तर पर उद्घाटित करने का प्रयास है समीक्ष्य संग्रह | जिसमें कुल 67 कविताएं ऐसे विषयों में बुनी गई है जिनका सीधा सरोकार भारतीयता से है | जीवन अनुभूतियों के साथ सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का उपक्रम इन कविताओं की विशेषता है जहाँ शायद ही ऐसा कोई कोना हो जो हमारे सांस्कृतिक और संस्कारित जीवन मूल्यों का परिचय न देता हो | कृति में स्त्री के सम्मान में रचनाएं है तो पुरुष गान भी रचा गया है | समसामयिक विषयों जैसे धरती की व्यथा,कोरोना से जंग, वैश्विक महामारी ,आज का दौर और समाज सुधारक जैसे विषयों के साथ तीज त्यौहार मानव मन के संवेदन रिश्तों को कलमबद्ध किया है |
”हाँ, मैं बदल गई हूँ” पूरी की पूरी सचेत स्त्री मन की कविता है | तो कुछ कविताएं भारत बोध भी देती है | ऐसे कई विषय हैं जो अपने समय का पुनरावलोकन भी है | भारतीय प्राचीन लिपियों पर स्तुतिगान इस संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है जिसे संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण कविता माना जा सकता है | आमतौर पर प्रियसी पर कविताएं लिखी जाती है,पत्नी पर कविताएं लिखी जाती है या बिटियों पर कविताएं पढ़ने को मिलती है इस संग्रह में बहु पर केंद्रित कुछ कविताएं हैं जो इसे विशिष्ट बनाते हुए एक बड़े बदलाव को रेखांकित करती है| समग्रतः कहें तो मनुष्य को नैतिक ही नहीं सांस्कृतिक पतन की ओर ले जाने वाली तमाम प्रवृत्त्तियां जब सब तरफ दिखाई देती है ऐसे दौर में लोक जीवन से जन्मी लोकगामी इन कविताओं का रचनात्मक उपक्रम स्वागत योग्य है |कहीं –कहीं कविताओं की छंद बद्धता ने उसकी भाव प्रवणता और गंभीरता को बाधित किया है बावजूद इसके कविता सांस्कृतिक मूल्यों का स्तुतिगान करती है |

समीक्षिका
डॉ.शोभा जैन

लेखिका समीक्षक, इंदौर /9424509155
ई-मेल–drshobhajain5@gmail. com

One thought on “‘पुस्तक समीक्षा’

  1. हार्दिक अभिनंदन और बधाई शुभकामनाएं आदरणीय डॉ रेखा जी को तथा एक अद्भुत समीक्षा के लिए बहुत-बहुत बधाई और अभिवादन प्रिय बहन शोभा जी को🙏🙏🌹🌹

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